पर्यावरण और परिस्थितिकीय पहलुएं

आखिरी अपडेट: 08/03/2018

प्राकृतिक संसाधनों के उत्‍कृष्‍ठ परिस्थितिकीय संतुलन को अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित रखते हुए भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण तथा निरंतर विकास एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के स्‍थानीय लोगों तथा उनके समक्ष उपलब्‍ध प्राकृतिक संसाधनों में बहुमुखी संबंध है। आम तौर पर ये लोग ईश्‍वर के द्वारा दी गई प्राकृतिक संसाधनों तथा विशेष रूप से वनों पर अपनी आजीविका तथा निवास के लिए आश्रित हैं। वनों तथा अन्‍य दूसरे प्राकृतिक संसाधनों का विनाश कर गैर योजनाबद्ध तरीके से विकास कार्य करना इनके अस्तित्‍व के लिए खतरा बन सकता है। इस अद्वितीय तथा अनमोल प्राकृतिक पर्यावरण एवं उत्‍कृष्‍ठ परिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के विशाल संसाधनों तथा विद्युत शक्‍यता का विकास योजनाबद्ध तथा निरंतर तरीके से करने पर विशेष ध्‍यान देना आवश्‍यक है।

पर्यावरण तथा परिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों पर नीपको उचित ध्‍यान देता है तथा अपनी परियोजनाओं के क्रियान्‍वयन तथा संचालन व रखरखाव के दौरान पर्यावरण तथा परिस्थितिकी पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को न्‍यूनतम करने के लिए पर्याप्‍त उपाय करता है। पर्यावरण तथा परिस्थितिकी सुरक्षा से संबंधित नियमों को कार्यान्वित करने तथा उससे बंधे रहने पर सर्वोच्‍च ध्‍यान देता है।

विद्युत मंत्रालय,भारत सरकार के तहत एक केंद्रीय क्षेत्र का सार्वजनिक उद्यम होने के नाते (एमओईएफ़ & सीसी), भारत सरकार के सभी नीतियों तथा दिशानिर्देशों का नीपको सख्‍ती से पालन करता है, जिससे कि पूर्वोत्‍तर की विशेष पर्यावरणीय परिस्थिति पर विशेष ध्‍यान रखते हुए विद्युत परियोजनाओं से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की पहचान कर उसे कम किया जा सके। निरंतर विकास के अपने लक्ष्‍य की प्राप्ति हेतु प्रत्‍येक परियोजना का पर्यावरण प्रभाव अध्‍ययन (ईआईए) किया गया। इसकी रिपोर्ट पर ध्‍यान दिया गया तथा पर्यावरण व वन मंत्रालय (एमओई एण्‍ड एफ), भारत सरकार से परियोजना के लिए प्राप्‍त की जाने वाली पर्यावरण स्‍वीकृति के लिए पर्यावरण प्रभाव अध्‍ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना रिपोर्टों का उचित रूप में उल्‍लेख किया जाता है।

प्रभाव का आकलन :

  • भूमि पर्यावरण पर प्रभाव
  • जल संसाधनों तथा जल गुणवत्ता पर प्रभाव
  • जलीय परिस्थितिकी, क्षेत्रीय वनस्पृति और प्राणी समूह पर प्रभाव
  • ध्वनि पर्यावरण पर प्रभाव
  • वायु प्रदूषण
  • सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण पर प्रभाव
  • पानी से संबंधित बीमारियों के बढ़ते मामलों पर
  • भूकंपनीयता प्रवृत्त जलाशय (आरआईएस)

पर्यावरण प्रबंधन योजना :

  • निर्माण क्षेत्र का भूनिर्माण एवं रेस्टोरेसन
  • प्रतिपूरक वनरोपण
  • वनरोपण
  • खदान तथा गंदगी निपटान साइट की उपयुक्तकता
  • ग्रीनबेल्टं विकास
  • अरद्न रोधक/भूमि संरक्षण उपाय
  • जलअधिग्रहण क्षेत्र प्रतिपाद योजना (सीएटी)
  • जल गुणवत्ता को बनाए रखना
  • सेडीमेंट लोड तथा प्रभाव का मॉनीटरिंग
  • जैव-विविधता संरक्षण योजना
  • जीविका हेतु नदी मत्स्य पालन
  • वनस्पाति उद्यान की स्थापना
  • शिकार विरोधी उपाय
  • ध्वनि कम करने के उपाय
  • वायू प्रदूषण नियंत्रण
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य उपचार प्रणाली
  • झूम कृषि पद्धति पर नियंत्रण के उपाय
  • सार्वजनिक उपयोग जैसे विद्यालय, डाकघर, बैंक, समुदाय गृह, बाजार, प्रार्थनागृह, कब्रगाह आदि का निर्माण करना
  • पुरातात्विक महत्व के स्थानों का संरक्षण
  • पुनर्वास तथा पुनर्स्थापन के उपाय
  • डेम ब्रेक अध्ययन तथा आपदा प्रबंधन योजना
  • पर्यावरण सुरक्षा उपायों को लागू करने हेतु जिला प्रशासन से विचार-विमर्श
  • राज्य व सरकार के प्राधिकारियों, जिला प्राधिकारियों, एनजीओ, पर्यावरणहित समूहों, स्थानीय समुदाय, ग्राम समिति, लोक प्रतिनिधि, जनता के मुखिया, विशिष्टा व्यंक्तियों आदि को लेकर आम सभा करना।

पर्यावरण प्रबंधन योजनाएं (ईएमपी) बना ली गई हैं तथा परियोजनाओं के निर्माण एवं इसके संचालन चरण के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को कम या समाप्‍त करने हेतु कार्यान्वित किया गया है।

नीपको ने अपने यहॉ पर्यावरण संबंधी सभी मामलों से निपटने के लिए अपने कारपोरेट कार्यालय में दिनांक 01 जून,2009 को एक पर्यावरण प्रकोष्‍ठ की स्‍थापना की है।

विद्युत मंत्रालय के तहत नीपको प्रथम सीपीएसयू है जिसे पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस) के लिए आईएसओ 14001-1996 स्‍वीकृत किया गया। पर्यावरण प्रभाव आकलन की तैयारी एवं पर्यावरण प्रबंधन योजना के गठन हेतु कंपनी ने पर्यावरण के क्षेत्र में विशेष सलाहकारों(एमओईएफ़&सीसी द्वारा मान्यता प्राप्त) को नियुक्त किया है ।

पर्यावरण प्रबंधन पर नीपको द्वारा विशेष ध्‍यान दिए जाने वाला क्षेत्र :

प्रतिपूरक वनीकरण :परियोजना के लिए वगैर वन के जमीन के लिए वन काटने की प्रतिपूर्ति के लिए काटे गए वन क्षेत्र के दुगने के बरावर की विकृत भूमि पर वृक्षारोपण किया जाता है तथा गैर-वन क्षेत्र व मामले में घटने वाले प्रभावित वन क्षेत्र के बराबर की भूमि पर प्रतिपूरक वृक्षारोपण किया जाता है।

ग्रीन-बेल्‍ड विकास (हरित पट्टी का विकास) : प्रतिपूरक वनीकरण के अलावा, विभिन्‍न परियोजना क्षेत्र, चिन्हित पथों के साथ-साथ जलाशय के इर्दगीर्द भूमि कटाव को रोकने के लिए हरित पट्टी का विकास किया जाता है। इस वृक्षारोपण में फल वाले वृक्षों, सजावटी वृक्ष, एवेन्‍यू वृक्षारोपण, छायादार वृक्षों के साथ-साथ झाडि़यॉ इत्‍यादि तथा तेजी से बढ़ने वाले वृक्षों को लगाया जाता है।

जल अधिकरण क्षेत्र (सीएटी) : गैर योजनावद्ध मानव गतिविधियों वन कटाव इत्‍यादि के कारण भूमि कटाव तथा भू-स्‍खलन के खतरा से लड़ने के लिए जलग्रहण क्षेत्र में भूमि कटाव को रोकनें के लिए पर्याप्‍त तौर पर उपाय किया जाना है जिससे कि जलाशय में परत जमने तथा परियोजना की उपयोगिता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से बचा जा सके।

जैव-विविधता संरक्षण : परियोजना के निर्माण से दूर्लभ जीवजंतु, स्‍थानीय वनस्‍पति और प्राणी समूह को हानि या विलुप्‍त हो सकते हैं। अत:परियोजना के जैव-विविधता वाले क्षेत्र में जैव-विविधता संरक्षण योजना बनाई गई है। अपने गैस आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं के लिए उपयुक्‍त तकनीक का निर्धारण करते समय संयंत्र के डिजाइन चरण में ही नीपको पर्यावरण से संबंधित विभिन्‍न पहलुओं को उसमें शामिल करता है। पर्यावरण मानको में समाहित सभी प्रावधानों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए नीपको ने ध्‍वनि तथा जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्‍नलिखित स्‍टेव-ऑफ आई प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली/उपकरण अधिष्‍ठापित किया है :

  • इलेक्ट्रोस्टाटिक प्रेसिपिटेटर्स
  • फ्यूल गैस स्टेकस
  • लॉ-नॉक्सर बर्नरस
  • न्यूलट्रालाजेशन पिट्स
  • ऑइल सेटिंग पिट्स
  • डीई एंड डीएस सिस्ट्म कूलिंग टावर
  • तरल अपशिष्ट उपचार संयंत्र व प्रबंधन प्रणाली
  • मलजल शोधन संयंत्र व सुविधा